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Article Dated 23rd February 2021

कर चोरी क्या है? - विशेष जानकारी

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर टैक्स, ब्याज या पेनल्टी की राशि की चोरी करता है तो उसे यदि ऐसी चोरी की राशि एक लाख रुपये तक हो तो कम से कम तीन माह एवं अधिकतम 3 वर्ष के कठोर कारावास एवं अर्थदण्ड से दण्डित किया जा सकता है तथा यदि चोरी की राशि एक लाख रूपये से अधिक है तो कम से कम 6 माह एवं अधिक से अधिक 7 वर्ष के कठोर कारावास एवं अर्थदण्ड से दण्डित किया जा सकता है।

कर चोरी क्या है

कर चोरी का अभिप्राय क्या है यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। आयकर कानून में इस बात को स्पष्टï किया गया है कि निम्नलिखित परिस्थितियां होने पर कर चोरी की मंशा मानी जायेगी एवं इस धारा के तहत कारावास की सजा होगी:-

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यदि किसी व्यक्ति के पास ऐेसे खाते या अन्य डाक्यूमेन्ट पाये जाते है जिनमें झूठे जमा खर्च है या झूठे स्टेटमेन्ट दिखाये गये है।

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यदि कोई व्यक्ति ऐसे खातों में या अन्य डाक्यूमेन्ट में झूंठी एन्ट्री करता है या करने का प्रयत्न करता है।

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यदि वह व्यक्ति जानबूझ कर खातों में कोई एण्ट्री नहीं करता है या स्टेटमेन्ट दर्ज नहीं करता है जो उसे करने चाहिए थे।

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यदि ऐसी परिस्थितियां पाई जाती है जो उस व्यक्ति को कर, ब्याज या पेनेल्टी की चोरी में मदद पहुंचा सकती थी।

एसेसमेन्ट के दौरान रिवाइज्ड रिटर्न पेश करने पर चोरी नहीं

करदाता यदि रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर देता है तो कर निर्धारण के दौरान पकडी गई गलतियों के लिए उसके खिलाफ अभियोग नही बनता है। करदाता ने अपनी रिटर्न वर्ष 1984-85 के लिए 4 जनवरी, 1985 को दाखिल करी। निर्धारण के दौरान आयकर अधिकारी ने पाया कि किसी श्री धर्मराज से 20,000/- रूपये एवं 10,000/-रूपये क्रमश: मार्च 2, 1984 एवं मार्च 13, 1984 को प्राप्त करना दिखाया गया था तथा एक दो दिन के बाद ही वापस करना भी दिखाया गया था साथ ही एक फर्म को 29,516/-रूपये का भुगतान करना भी दिखाया था। जांच के दौरान श्री धर्मराज ने ऐसे लेनदेन से साफ इन्कार कर दिया तथा अन्य फर्म के खातों की धारा 131 में नोटिस के बाद जांच में पाया गया कि खातों में कटिंग एवं रकम मिटा कर प्रविष्ठिï की गई है। बयानों में पार्टी ने यह बात कबूल भी कर ली तथा पार्ट टाईम एकाउन्टेन्ट ने भी ऐसा करना स्वीकार कर लिया। विभाग द्वारा अदालत में अभियोग दायर करने पर अदालत ने माना कि यह जानबूझ कर कर चोरी की नियत से नही किया गया है इसलिए अभियुक्तों को दोष मुक्त कर दिया गया। मद्रास उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को यथावत रखा। आई. टी. ओ. बनाम राधाकृष्ण स्टोर्स, स्टेशनरी एण्ड बुक मर्चेन्ट्स एवं अन्य (1999) 240 आई. टी. आर. 544.

कानून में परिवर्तन लागू होने की तिथि से पूर्व के अपराध के लिए कोई सजा नही

पटना उच्च न्यायालय ने क्वालिटी एवं अन्य बनाम आई.टी.ओ. एवं अन्य (1999) 239 आई.टी.आर 290 में माना कि कानून लागू होने से पहले के अपराध के लिए मुकदमा नही चलाया जा सकता है। 1 अक्टूबर 1975 से पूर्व रिटर्न प्रस्तुत न करने पर धारा 276सी के तहत अपराध बनता था परन्तु 1 अक्टूबर, 1975 से कर  चोरी करने पर धारा 276सी के तहत अपराध का कानून लागू हो गया। न्यायालय ने कहा कि धारा 276सी के तहत जानबूझ कर चोरी करने के लिए 1 अक्टूबर 1975 से पहले किये अपराध के लिए मुकदमा नही चलाया जा सकता है।

देरी से रिटर्न दाखिल करना तथा वो भी तलाशी एवं जब्ती की कार्यवाही के पश्चात् एवं एसेसड् इनकम रिटर्न इनकम से कहीं ज्यादा होने पर क्या कर चोरी मानी जायेगी?

यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम बनवारी लाल अग्रवाल (1999) 238 आई. टी. आर. 461 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि देरी से रिटर्न दाखिल करना तथा एसेसड इनकम एवं रिटर्न इनकम में भारी अन्तर अभियोग चलाने के लिए उचित कारण है तथा उसने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुये निचली अदालत को कानून के अनुसार कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया। मामले के तथ्यों के अनुसार करदाता ने तलाशी एवं जब्ती की कार्यवाही के बाद रिटर्न दाखिल किये तथा विभाग ने जो आय का निर्धारण किया वह रिटर्न इनकम से कही अधिक था। विभाग ने करदाता के खिलाफ धारा 276C के तहत अभियोग की कार्यवाही प्रारम्भ की। करदाता ने धारा 482 ऑफ क्रीमीनल प्रोसीजर एक्ट, 1973 के तहत उच्च न्यायालय में अपील की तथा तर्क दिया कि चूंकि सारी कार्यवाही विभाग के साथ इस समझौते के बाद की गई है कि उसके खिलाफ अभियोग की कोई कार्यवाही नही होगी तथा साथ ही विभाग ने उसे धारा 279(2) के तहत एक मुश्त निपटारे के लिए भी नोटिस जारी नही किया हैं इसलिए अभियोग की कार्यवाही अवैध है। उच्च न्यायालय ने माना कि कर निर्धारण की कार्यवाही आपसी समझौते के तहत की गई थी अत: अब अभियोग की कोई कार्यवाही करदाता के विरूद्घ नहीं की जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने यह भी माना कि धारा 279(2) के तहत भी करदाता को अभियोग की कार्यवाही शुरू होने के पूर्व अवसर नही दिया गया। विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि आयकर अधिनियम में ऐसा कुछ नही है कि विभाग किसी समझौते के तहत कर निर्धारण करें। यदि ऐसा कुछ था भी तो उसे निचली अदालत के सामने साबित करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि धारा 279(2) के तहत करदाता को नोटिस प्राप्त करने का कोई अधिकार नही बनता है यह तो विभाग की मर्जी है कि एक मुश्त निपटारे का अवसर दे अथवा नही। यह करदाता का अधिकार नही है।

धारा 271(1)( C) में पेनल्टी निरस्त होने के बाद अभियोग चलाना अनावश्यक कार्यवाही

पटना उच्च न्यायालय ने कैलाश स्टेान वक्र्स एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य 236 आई.टी.आर. 876 में निर्णय दिया कि यदि आयकर अधिकारी द्वारा 271(1) (C) के तहत लगाई गई पेनल्टी को आयकर आयुक्त (अपील्स) ने निरस्त कर दिया है तथा ट्राइब्यूनल ने भी उस फै सले को सही करार दे दिया है तो इसके बाद विभाग द्वारा कर चोरी के मामले में धारा 276C के तहत अभियोग दाखिल करना एक अनावश्यक कार्यवाही है तथा उच्च न्यायालय ने मामले को खारिज कर दिया।

धारा 273 C के तहत पेनल्टी छोड देने के बावजूद धारा 276C की कार्यवाही वैधानिक

मद्रास उच्च न्यायालय ने श्री पद्मालय मूवीज बनाम ए.सी.आई.टी. (2002) 124 टैक्समैन 84 के मामले में निर्णय देते हुए कहा कि कमीश्नर द्वारा धारा 273A के तहत पेनल्टी छोड देने (waived) के निर्णय के बावजूद भी अदालत में चल रहे अभियोग के मामले को समाप्त नही माना जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में जब कि अदालत ने अभियुक्तों के मामले में गवाहों के आधार पर प्रथम दृष्टि अपराध बनना पाया हो, निचली अदालत की कार्यवाही में व्यवधान नही डाला जा सकता है।

करदाता को नोटिस जारी किये बिना अभियोग की कार्यवाही शुरू करना गैर कानूनी

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने आई.टी.ओ बनाम दयाल सन्स (2002) 123 टैक्समैन 192 के मामले में निर्णय दिया कि यदि धारा 276C के तहत अभियोग की कार्यवाही बिना करदाता को समुचित सुनवाई का अवसर दिये शुरू कर दी गई है तो ऐसी कार्यवाही गैर कानूनी होगी। इस मामले में करदाता के खिलाफ विभाग ने कोर्ट में शिकायत दर्ज कर दी तथा शिकायत दर्ज करने से पूर्व उसको सुनवाई का अवसर विभाग ने नही दिया। उच्च न्यायालय ने कहा कि न्याय के नैसर्गिक सिद्घान्त के अनुसार बिना सुनवाई का अवसर दिये अभियोग की कार्यवाही शुरू करना गैर कानूनी है।

डाक्टर द्वारा धारा 80DDB के तहत छूट प्राप्त करने के लिए जारी झूठे प्रमाण पत्र के आधार पर 276C की कार्यवाही वैधानिक

मद्रास उच्च न्यायालय ने डा. एन. कुमार बनाम आई.टी.ओ. (2002) 123 टैक्समैन 368 के  मामले में माना कि यदि डाक्टर ने झूंठा सर्टीफिकेट देकर करदाता को कर की चोरी करने में मदद की है तो उसके खिलाफ धारा 276C के तहत कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

आय का स्रोत न बता पाने पर धारा 276C की कार्यवाही नही

यदि करदाता ने अपनी आयकर विवरणी में कोई आय दर्शाई है परन्तु वह उस आय के स्रोत के बारे में कोई जानकारी नहीं दे पाता है तो उसके खिलाफ अभियोग की कार्यवाही नहीं की जा सकती है। पटना उच्च न्यायालय ने पटना गुनिया हाऊस बनाम सी.आई.टी (2002) 123 टैक्समैन 883 में यह अभिनिर्णित किया कि स्रोत बताने में चूक करना आय छिपाने या आय दिखाने से मना करने के बराबर नहीं माना जा सकता है अत: धारा 276C के तहत दण्डनीय नहीं है।

बुक्स को सही मानते हुए किसी रकम को आय में जोडना कर चोरी नहीं

यदि कर निर्धारण के दौरान आयकर अधिकारी खाते में जमा किसी रकम को सही नहीं मानता है तथा उसे करदाता की आय में जोड कर निर्धारण कर देता है तो वह कर चोरी की श्रेणी में नही माना जा सकता है। पटना उच्च न्यायालन ने राम गुलाम शाह एण्ड सन्स बनाम सी.आई.टी (2002) 123 टैक्समैन 891 में माना कि सिर्फ आयकर अधिकारी द्वारा खातों में जमा किसी रकम को स्वीकार न करना तथा उसे आय में जोड़ना कर चोरी नही है तथा ऐसे मामलों में धारा 276C के तहत अभियोग नही शुरू किया जा सकता है।

अभियोग दर्ज होने के पश्चात् आयुक्त (अपील्स) द्वारा आय छुपाना न मानने पर ट्रायल कोर्ट में मामला स्वत: ही निरस्त

करदाता के खिलाफ धारा 276C के तहत अभियोग दर्ज होने के पश्चात् आयुक्त (अपील्स) ने अपील निर्णय में कहा कि क्लोंजिग स्टॉक का मूल्यांकन सही तरीके से किया गया है तथा मात्रा आदि में कोई गलती नहीं हैं। इस आधार पर करदाता ने मजिस्ट्रेट की अदालत में प्रार्थना पत्र पेश कर कहा कि चूंकि विभाग इसे कर चोरी नहीं मानता है अत: मामले को समाप्त किया जाये। मजिस्ट्रेट ने करदाता का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया और कहा कि विभाग के सम्मुख अपील एवं अदालत की कार्यवाही दोनों अलग-अलग है एवं अदालत बिना विभागीय अधिकारियों द्वारा जारी आदेश के संदर्भ में स्वतंत्र रूप से मामले में निर्णय लेगी। बम्बई उच्च न्यायालय ने गोविन्द के पोपले बनाम जी.एम.कीना प्रथम आई.टी.ओ (2002) 119 टैक्समैन 218 के उक्त मामले में निर्णय दिया कि चूंकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो अवधारणा हाल ही प्रतिपादित की है उसके  अनुसार अदालत का फैसला सही नही है। जिस मुदे् पर अभियोग की कार्यवाही शुरू की गई है वो मुद्दा जब विभाग ने ही स्वीकार कर लिया है तो कार्यवाही चालू रखने का कोई ओचित्य नही रह जाता है।

कर योग्य आय होने के बावजूद रिटर्न दाखिल नहीं करना कर चोरी मानी जायेगी

करदाता ने निर्धारण वर्ष 1980-81 से 1984-85 तक की रिटर्न प्रस्तुत नही की। विभाग द्वारा धारा 139(2) में नोटिस जारी करने पर रिटर्न प्रस्तुत की गई तथा कर, ब्याज एवं शास्ती जमा करा दी गई। विभाग ने धारा 276C के तहत अभियोग की कार्यवाही अदालत में शुरू की जिस पर करदाता ने उच्च न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया तथा तर्क दिया कि इस तरह के सैकडों मामलों में विभाग कोई अभियोग की कार्यवाही नही करता है तथा उसकी अपराध की मानसिकता (Mensrea) नही थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने विनोद चन्द्र सी-पटेल बनाम स्टेट ऑफ गुजरात (2001) 118 टैक्समैन 526 के उक्त मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा कि अपराध की मानसिकता होना कोई आधार नही है। चूंकि कर चोरी का प्रयास किया गया है अत: अभियोग धारा 276(C) के तहत चलाया जा सकता है।

आयकर विभाग द्वारा किसी प्रश्नावली के भरवाने के दौरान किसी आय का पता लगने पर करदाता द्वारा रिवाइज्ड रिटर्न भरना कर चोरी नहीं

धरमचन्द जैन बनाम स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य (1998) 232 आई. टी. आर. 84 में करदाता ने अपनी रिटर्न 87,240/- रूपये आय दर्शित करते हुए 8 अगस्त 1990 को दाखिल की। रिटर्न भरने के पश्चात् आयकर विभाग ने एक प्रश्नावली भेजी जिसको भरने पर यह पता लगा कि 1,09,050/- रूपये की आय रिटर्न में दिखाने से रह गई है। इस पर करदाता ने उस पर टैक्स जमा करा दिया तथा रिवाइज रिटर्न पेश कर दी। विभाग ने कर चोरी के आरोप में अभियोग न्यायालय में पेश किया। उच्च न्यायालय ने माना कि यह जानबूझ कर की गई कर चोरी का मामला नही है अत: ऐसी परिस्थिति में कानूनन धारा 276(C) केतहत अभियोग नहीचलायाजासकताहै।

जानबूझ कर बुक्स एवं अन्य डाक्यूमेन्ट प्रस्तुत न करने पर जेल की सजा

धारा 276डी के वर्तमान प्रावधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति धारा 142(1) के तहत जारी नोटिस की पालना में या धारा 142(2ए) के निर्देशों की पालना में बुक्स एवं अन्य कागजात प्रस्तुत नहीं करता है तो उसे 1 वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है या उस पर जब तक उसका डिफाल्ट जारी रहता है जुर्माना लगाया जा सकता है।

अब इस प्रावधान को अधिक कठोर बना दिया गया है। 1 अक्टूबर 2014 से इस अपराध के लिए आवश्यक रूप से जेल की सजा एवं जुर्माने दोनों का प्रावधान किया गया है।

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